मृत्तिका
प्रश्न: “मृत्तिका” शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर: “मृत्तिका” शब्द का अर्थ है मिट्टी।
बोध एवं विचार
1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक या दो वाक्यों में दें:
(क) रौंदे और जोते जाने पर भी मिट्टी किस रूप में बदल जाती है?
उत्तर: रौंदे और जोते जाने पर भी मिट्टी मातृरूप में बदल जाती है।
(ख) मिट्टी के “मातृरूपा” होने का आशय क्या है?
उत्तर: मिट्टी के “मातृरूपा” होने का आशय यह है कि मिट्टी मनुष्य को धन-धान्य देकर उसका पालन-पोषण करती है।
(ग) जब मनुष्य उद्यमशील रहकर अपने अहंकार को पराजित करता है तो मिट्टी उसके लिए क्या बन जाती है?
उत्तर: जब मनुष्य उद्यमशील रहकर अपने अहंकार को पराजित करता है तब मिट्टी उसके लिए कामधेनु शक्ति बन जाती है। वह उसके लिए आराध्या बन जाती है।
2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
(क) “मृत्तिका” कविता में पुरुषार्थी मनुष्य के हाथों आकार पाते मिट्टी के किन-किन स्वरूपों का उल्लेख किया गया है?
उत्तर: “मृत्तिका” कविता में कवि ने “मिट्टी” के माँ, प्रिया, शिशु और देवी रूपों का उल्लेख किया है। माँ के रूप में वह मनुष्य को धन-धान्य देकर पालन-पोषण करती है। प्रिया के रूप में वह कलश बन कर जल देती है। शिशु के रूप में वह खिलौने देती है और देवी के रूप में प्रतिमा बनकर वह मनुष्य को शक्ति प्रदान करती है।
(ख) मिट्टी के किस रूप को ‘प्रिय रूप’ माना है। क्यों?
उत्तर: मिट्टी के कुंभ और कलश रूप को ‘प्रिय रूप’ माना जाता है। इसलिए कि इस रूप में मिट्टी मनुष्य को अपने सुंदर रूप से तथा मीठे जल से तृप्त करती है। इस प्रकार मिट्टी बाहर भीतर से रसवती बनकर उतरती है।
(ग) मिट्टी प्रजारूपा कैसे हो जाती है?
उत्तर: जब बच्चे खिलौने के लिए मचलते हैं तो मनुष्य अपने परिश्रम के द्वारा मिट्टी को तरह-तरह खिलौने का रूप दे देता है। इससे बच्चे प्रसन्न हो जाते हैं। इस प्रकार मिट्टी प्रजारूपा बन जाती है।
(ङ) पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व क्यों कहा गया है?
उत्तर: कवि ने पुरुषार्थ को सबसे बड़ा देवत्व इसलिए कहा गया है कि उसी के प्रयत्न से मिट्टी पर प्रयत्न नहीं किया जाये तो उससे से कोई भी रूप नहीं बन सकता।
(च) मिट्टी और मनुष्य में तुम किस भूमिका को अधिक महत्वपूर्ण मानते हो और क्यों?
उत्तर: मैं मिट्टी और मनुष्य में से मनुष्य की भूमिका को अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ। क्योंकि मिट्टी में उर्वर शक्ति तो है। किंतु मानवीय श्रम के बिना वह सोई पड़ी रहती है। उससे कोई लाभ नहीं होता।
3. सप्रसंग व्याख्या करें:
(क) पर जब भी तुम
अपने पुरुषार्थ-अर्जित स्वप्न से मुझे पुकारते हो
तब मैं —
अपने ग्राम्य देवत्व के साथ चिन्मयी शक्ति हो जाती हूँ।
उत्तर: ये पंक्तियां हमारी पाठ्य पुस्तक के अंतर्गत “मृत्तिका” नामक कविता से उद्धृत किया गया है। इसमें कवि नरेश मेहता जी ने पुरुषार्थी मनुष्य और मिट्टी के संबंधों पर प्रकाश डाला है।
यहाँ कवि का कहना यह है कि मिट्टी में असीम शक्तियाँ सोई पड़ी हैं। जब मनुष्य परास्त होने को आई है, तब मिट्टी उसे अवश्य सहारा देती है। आवश्यकता पड़ने पर मिट्टी उसके लिए शक्ति का अवतार धारण कर लेती है।
(ख) यह सबसे बड़ा देवत्व है, कि तुम पुरुषार्थ करते मनुष्य हो और मैं स्वरूप पाती मृत्तिका।
उत्तर: यह पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक के अंतर्गत “मृत्तिका” नामक कविता से उल्लेख किया गया है। इसमें कवि नरेश मेहता जी ने पुरुषार्थी मनुष्य और मिट्टी के संबंधों पर प्रकाश डाला है।
यहाँ कवि का कहना यह है कि मनुष्य का सबसे बड़ा देवत्व यह है कि वह अपनी इच्छा से प्रेरित होकर पुरुषार्थ करता है। यह पुरुषार्थ ही देवत्व है। इसके होने पर मिट्टी अनेक रूपों में बदल जाती है। अर्थात मनुष्य अपने पुरुषार्थ से सृष्टि में अनेक सुख साधन बन जाते हैं।